prayer and meditations

Matthew 5:1-12 – मत्ती 5:1-12 -馬太福音 5:1-12

यीशु ने जब यह बड़ी भीड़ देखी, तो वह एक पहाड़ पर चला गया। वहाँ वह बैठ गया और उसके अनुयायी उसके पास आ गये। तब यीशु ने उन्हें उपदेश देते हुए कहा:

“धन्य हैं वे जो हृदय से दीन हैं, स्वर्ग का राज्य उनके लिए है।

धन्य हैं वे जो शोक करते हैं, क्योंकि परमेश्वर उन्हें सांतवन देता है

धन्य हैं वे जो नम्र हैं क्योंकि यह पृथ्वी उन्हीं की है।

धन्य हैं वे जो नीति के प्रति भूखे और प्यासे रहते हैं!

क्योंकि परमेश्वर उन्हें संतोष देगा, तृप्ति देगा।

धन्य हैं वे जो दयालु हैं क्योंकि उन पर दया गगन से बरसेगी।

धन्य हैं वे जो हृदय के शुद्ध हैं क्योंकि वे परमेश्वर के दर्शन करेंगे।

धन्य हैं वे जो शान्ति के काम करते हैं। क्योंकि वे परमेश्वर के पुत्र कहलायेंगे।

धन्य हैं वे जो नीति के हित में यातनाएँ भोगते हैं। स्वर्ग का राज्य उनके लिये ही है।

“और तुम भी धन्य हो क्योंकि जब लोग तुम्हारा अपमान करें, तुम्हें यातनाएँ दें, और मेरे लिये तुम्हारे विरोध में तरह तरह की झूठी बातें कहें, बस इसलिये कि तुम मेरे अनुयायी हो, तब तुम प्रसन्न रहना, आनन्द से रहना, क्योंकि स्वर्ग में तुम्हें इसका प्रतिफल मिलेगा। यह वैसा ही है जैसे तुमसे पहले के भविष्यवक्ताओं को लोगों ने सताया था।

耶穌看見這許多的人,就上了山,既已坐下,門徒到他跟前來,他就開口教訓他們,說: 「虛心的人有福了!因為天國是他們的。 哀慟的人有福了!因為他們必得安慰。  溫柔的人有福了!因為他們必承受地土。 飢渴慕義的人有福了!因為他們必得飽足。 憐恤人的人有福了!因為他們必蒙憐恤。 清心的人有福了!因為他們必得見神。 使人和睦的人有福了!因為他們必稱為神的兒子。為義受逼迫的人有福了!因為天國是他們的。人若因我辱罵你們,逼迫你們,捏造各樣壞話毀謗你們,你們就有福了。 應當歡喜快樂,因為你們在天上的賞賜是大的。在你們以前的先知,人也是這樣逼迫他們。

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