Hebrews 9 – इब्रानियों – 希伯來書

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Now even the first covenant had regulations for worship and an earthly place of holiness. For a tent was prepared, the first section, in which were the lampstand and the table and the bread of the Presence. It is called the Holy Place. Behind the second curtain was a second section called the Most Holy Place, having the golden altar of incense and the ark of the covenant covered on all sides with gold, in which was a golden urn holding the manna, and Aaron’s staff that budded, and the tablets of the covenant. Above it were the cherubim of glory overshadowing the mercy seat. Of these things we cannot now speak in detail.

These preparations having thus been made, the priests go regularly into the first section, performing their ritual duties, but into the second only the high priest goes, and he but once a year, and not without taking blood, which he offers for himself and for the unintentional sins of the people. By this the Holy Spirit indicates that the way into the holy places is not yet opened as long as the first section is still standing (which is symbolic for the present age). According to this arrangement, gifts and sacrifices are offered that cannot perfect the conscience of the worshiper, but deal only with food and drink and various washings, regulations for the body imposed until the time of reformation.

But when Christ appeared as a high priest of the good things that have come, then through the greater and more perfect tent (not made with hands, that is, not of this creation) he entered once for all into the holy places, not by means of the blood of goats and calves but by means of his own blood, thus securing an eternal redemption. For if the blood of goats and bulls, and the sprinkling of defiled persons with the ashes of a heifer, sanctify for the purification of the flesh, how much more will the blood of Christ, who through the eternal Spirit offered himself without blemish to God, purify our conscience from dead works to serve the living God.

Therefore he is the mediator of a new covenant, so that those who are called may receive the promised eternal inheritance, since a death has occurred that redeems them from the transgressions committed under the first covenant. For where a will is involved, the death of the one who made it must be established. For a will takes effect only at death, since it is not in force as long as the one who made it is alive. Therefore not even the first covenant was inaugurated without blood. For when every commandment of the law had been declared by Moses to all the people, he took the blood of calves and goats, with water and scarlet wool and hyssop, and sprinkled both the book itself and all the people, saying, “This is the blood of the covenant that God commanded for you.” And in the same way he sprinkled with the blood both the tent and all the vessels used in worship. Indeed, under the law almost everything is purified with blood, and without the shedding of blood there is no forgiveness of sins.

Thus it was necessary for the copies of the heavenly things to be purified with these rites, but the heavenly things themselves with better sacrifices than these. For Christ has entered, not into holy places made with hands, which are copies of the true things, but into heaven itself, now to appear in the presence of God on our behalf. Nor was it to offer himself repeatedly, as the high priest enters the holy places every year with blood not his own, for then he would have had to suffer repeatedly since the foundation of the world. But as it is, he has appeared once for all at the end of the ages to put away sin by the sacrifice of himself. And just as it is appointed for man to die once, and after that comes judgment, so Christ, having been offered once to bear the sins of many, will appear a second time, not to deal with sin but to save those who are eagerly waiting for him.

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अब देखो पहले वाचा में भी उपासना के नियम थे। तथा एक मनुष्य के हाथों का बना उपासना गृह भी था। एक तम्बू बनाया गया था जिसके पहले कक्ष में दीपाधार थे, मेज़ थी और भेंट की रोटी थी। इसे पवित्र स्थान कहा जाता था।दूसरे परदे के पीछे एक और कक्ष था जिसे परम पवित्र कहा जाता है। इसमें सुगन्धित सामग्री के लिए सोने की वेदी और सोने की मढ़ी वाचा की सन्दूक थी। इस सन्दूक में सोने का बना मन्ना का एक पात्र था, हारून की वह छड़ी थी जिस पर कोंपलें फूटी थीं तथा वाचा के पत्थर के पतरे थे।सन्दूक के ऊपर परमेश्वर की महिमामय उपस्थिति के प्रतीक यानी करूब बने थे जो क्षमा के स्थान पर छाया कर रहे थे। किन्तु इस समय हम इन बातों की विस्तार के साथ चर्चा नहीं कर सकते।

सब कुछ इस प्रकार व्यवस्थित हो जाने के बाद याजक बाहरी कक्ष में प्रति दिन प्रवेश करके अपनी सेवा का काम करने लगे। किन्तु भीतरी कक्ष में केवल प्रमुख याजक ही प्रवेश करता था और वह भी साल में एक बार। वह बिना उस लहू के कभी प्रवेश नहीं करता था जिसे वह स्वयं अपने द्वारा और लोगों के द्वारा अनजाने में किए गए पापों के लिए भेंट चढ़ाता था।

इसके द्वारा पवित्र आत्मा यह दर्शाया करता था कि जब तक अभी पहला तम्बू खड़ा हुआ है, तब तक परम पवित्र स्थान का मार्ग उजागर नहीं हो पाता।यह आज के युग के लिए एक प्रतीक है जो यह दर्शाता है कि वे भेंटे और बलिदान जिन्हें अर्पित किया जा रहा है, उपासना करने वाले की चेतना को शुद्ध नहीं कर सकतीं।ये तो बस खाने-पीने और अनेक पर्व विशेष-स्थानों के बाहरी नियम हैं और नयी व्यवस्था के समय तक के लिए ही ये लागू होते हैं।

किन्तु अब मसीह इस और अच्छी व्यवस्था का, जो अब हमारे पास है, प्रमुख याजक बनकर आ गया है। उसने उस अधिक उत्तम और सम्पूर्ण तम्बू में से होकर प्रवेश किया जो मनुष्य के हाथों की बनाई हुई नहीं थी। अर्थात् जो सांसारिक नहीं है। बकरों और बछड़ों के लहू को लेकर उसने प्रवेश नहीं किया था बल्कि सदा-सर्वदा के लिए भेंट स्वरूप अपने ही लहू को लेकर परम पवित्र स्थान में प्रविष्ट हुआ था। इस प्रकार उसने हमारे लिए पापों से अनन्त छुटकारे सुनिश्चित कर दिए हैं।

बकरों और साँडों का लहू तथा बछिया की भभूत का उन पर छिड़का जाना, अशुद्धों को शुद्ध बनाता है ताकि वे बाहरी तौर पर पवित्र हो जाएँ। जब यह सच है तो मसीह का लहू कितना प्रभावशाली होगा। उसने अनन्त आत्मा के द्वारा अपने आपको एक सम्पूर्ण बलि के रूप में परमेश्वर को समर्पित कर दिया। सो उसका लहू हमारी चेतना को उन कर्मों से छुटकारा दिलाएगा जो मृत्यु की ओर ले जाते हैं ताकि हम सजीव परमेश्वर की सेवा कर सकें।

इसी कारण से मसीह एक नए वाचा का मध्यस्थ बना ताकि जिन्हें बुलाया गया है, वे उत्तराधिकार का अनन्त आशीर्वाद पा सकें जिसकी परमेश्वर ने प्रतिज्ञा की थी। अब देखो, पहले वाचा के अधीन किए गए पापों से उन्हें मुक्त कराने के लिए फिरौती के रूप में वह अपने प्राण दे चुका है।

जहाँ तक वसीयतनामे  का प्रश्न है, तो उसके लिए जिसने उसे लिखा है, उसकी मृत्यु को प्रमाणित किया जाना आवश्यक है। क्योंकि कोई वसीयतनामा केवल तभी प्रभावी होता है जब उसके लिखने वाले की मृत्यु हो जाती है। जब तक उसको लिखने वाला जीवित रहता है, वह कभी प्रभावी नहीं होता। इसलिए पहली वाचा भी बिना एक मृत्यु और लहू के गिराए कार्यान्वित नहीं किया गया। मूसा जब व्यवस्था के विधान के सभी आदेशों को सब लोगों को घोषणा कर चुका तो उसने जल के साथ बकरों और बछड़ों के लहू को लाल ऊन और हिस्सप की टहनियों से चर्मपत्रों और सभी लोगों पर छिड़क दिया था। उसने कहा था, “यह उस वाचा का लहू है, परमेश्वर ने जिसके पालन की आज्ञा तुम्हें दी है।” उसने इसी प्रकार तम्बू और उपासना उत्सवों में काम आने वाली हर वस्तु पर लहू छिड़का था। वास्तव में व्यवस्था चाहती है कि प्रायः हर वस्तु को लहू से शुद्ध किया जाए। और बिना लहू बहाये क्षमा है ही नहीं।

तो फिर यह आवश्यक है कि वे वस्तुएँ जो स्वर्ग की प्रतिकृति हैं, उन्हें पशुओं के बलिदानों से शुद्ध किया जाए किन्तु स्वर्ग की वस्तुएँ तो इनसे भी उत्तम बलिदानों से शुद्ध किए जाने की अपेक्षा करती हैं। मसीह ने मनुष्य के हाथों के बने परम पवित्र स्थान में, जो सच्चे परम पवित्र स्थान की एक प्रतिकृति मात्र था, प्रवेश नहीं किया। उसने तो स्वयं स्वर्ग में ही प्रवेश किया ताकि अब वह हमारी ओर से परमेश्वर की उपस्थिति में प्रकट हो।

और न ही अपना बार-बार बलिदान चढ़ाने के लिए उसने स्वर्ग में उस प्रकार प्रवेश किया जैसे महायाजक उस लहू के साथ, जो उसका अपना नहीं है, परम पवित्र स्थान में हर साल प्रवेश करता है। नहीं तो फिर मसीह को सृष्टि के आदि से ही अनेक बार यातनाएँ झेलनी पड़तीं। किन्तु अब देखो, इतिहास के चरम बिन्दु पर अपने बलिदान के द्वारा पापों का अंत करने के लिए वह सदा सदा के लिए एक ही बार प्रकट हो गया है।

जैसे एक बार मरना और उसके बाद न्याय का सामना करना मनुष्य की नियति है। सो वैसे ही मसीह को, एक ही बार अनेक व्यक्तियों के पापों को उठाने के लिए बलिदान कर दिया गया। और वह पापों को वहन करने के लिए नहीं, बल्कि जो उसकी बाट जोह रहे हैं, उनके लिए उद्धार लाने को फिर दूसरी बार प्रकट होगा।

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原來前約有禮拜的條例和屬世界的聖幕。因為有預備的帳幕,頭一層叫做聖所,裡面有燈臺、桌子和陳設餅。第二幔子後又有一層帳幕,叫做至聖所,有金香爐,有包金的約櫃,櫃裡有盛嗎哪的金罐和亞倫發過芽的杖並兩塊約版,櫃上面有榮耀基路伯的影罩著施恩座。這幾件我現在不能一一細說。這些物件既如此預備齊了,眾祭司就常進頭一層帳幕,行拜神的禮。至於第二層帳幕,唯有大祭司一年一次獨自進去,沒有不帶著血為自己和百姓的過錯獻上。聖靈用此指明:頭一層帳幕仍存的時候,進入至聖所的路還未顯明。那頭一層帳幕做現今的一個表樣,所獻的禮物和祭物就著良心說,都不能叫禮拜的人得以完全。這些事,連那飲食和諸般洗濯的規矩,都不過是屬肉體的條例,命定到振興的時候為止。

但現在基督已經來到,做了將來美事的大祭司,經過那更大、更全備的帳幕,不是人手所造,也不是屬乎這世界的。並且不用山羊和牛犢的血,乃用自己的血,只一次進入聖所,成了永遠贖罪的事。若山羊和公牛的血並母牛犢的灰灑在不潔的人身上,尚且叫人成聖,身體潔淨,何況基督藉著永遠的靈,將自己無瑕無疵獻給神,他的血豈不更能洗淨你們的心,除去你們的死行,使你們侍奉那永生神嗎?為此,他做了新約的中保,既然受死贖了人在前約之時所犯的罪過,便叫蒙召之人得著所應許永遠的產業。凡有遺命,必須等到留遺命的人死了。因為人死了,遺命才有效力,若留遺命的尚在,那遺命還有用處嗎?所以,前約也不是不用血立的。因為摩西當日照著律法將各樣誡命傳給眾百姓,就拿朱紅色絨和牛膝草,把牛犢、山羊的血和水灑在書上,又灑在眾百姓身上,說:「這血就是神與你們立約的憑據。」他又照樣把血灑在帳幕和各樣器皿上。按著律法,凡物差不多都是用血潔淨的,若不流血,罪就不得赦免了。

照著天上樣式做的物件必須用這些祭物去潔淨,但那天上的本物自然當用更美的祭物去潔淨。因為基督並不是進了人手所造的聖所——這不過是真聖所的影像——乃是進了天堂,如今為我們顯在神面前。也不是多次將自己獻上,像那大祭司每年帶著牛羊的血進入聖所。如果這樣,他從創世以來,就必多次受苦了。但如今在這末世顯現一次,把自己獻為祭,好除掉罪。按著定命,人人都有一死,死後且有審判;像這樣,基督既然一次被獻,擔當了多人的罪,將來要向那等候他的人第二次顯現,並與罪無關,乃是為拯救他們。

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