Hebrews 11 – इब्रानियों – 希伯來書

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Now faith is the assurance of things hoped for, the conviction of things not seen. For by it the people of old received their commendation. By faith we understand that the universe was created by the word of God, so that what is seen was not made out of things that are visible.

By faith Abel offered to God a more acceptable sacrifice than Cain, through which he was commended as righteous, God commending him by accepting his gifts. And through his faith, though he died, he still speaks. By faith Enoch was taken up so that he should not see death, and he was not found, because God had taken him. Now before he was taken he was commended as having pleased God. And without faith it is impossible to please him, for whoever would draw near to God must believe that he exists and that he rewards those who seek him. By faith Noah, being warned by God concerning events as yet unseen, in reverent fear constructed an ark for the saving of his household. By this he condemned the world and became an heir of the righteousness that comes by faith.

By faith Abraham obeyed when he was called to go out to a place that he was to receive as an inheritance. And he went out, not knowing where he was going. By faith he went to live in the land of promise, as in a foreign land, living in tents with Isaac and Jacob, heirs with him of the same promise. For he was looking forward to the city that has foundations, whose designer and builder is God. By faith Sarah herself received power to conceive, even when she was past the age, since she considered him faithful who had promised. Therefore from one man, and him as good as dead, were born descendants as many as the stars of heaven and as many as the innumerable grains of sand by the seashore.

These all died in faith, not having received the things promised, but having seen them and greeted them from afar, and having acknowledged that they were strangers and exiles on the earth. For people who speak thus make it clear that they are seeking a homeland. If they had been thinking of that land from which they had gone out, they would have had opportunity to return. But as it is, they desire a better country, that is, a heavenly one. Therefore God is not ashamed to be called their God, for he has prepared for them a city.

By faith Abraham, when he was tested, offered up Isaac, and he who had received the promises was in the act of offering up his only son, of whom it was said, “Through Isaac shall your offspring be named.” He considered that God was able even to raise him from the dead, from which, figuratively speaking, he did receive him back. By faith Isaac invoked future blessings on Jacob and Esau. By faith Jacob, when dying, blessed each of the sons of Joseph, bowing in worship over the head of his staff. By faith Joseph, at the end of his life, made mention of the exodus of the Israelites and gave directions concerning his bones.

By faith Moses, when he was born, was hidden for three months by his parents, because they saw that the child was beautiful, and they were not afraid of the king’s edict. By faith Moses, when he was grown up, refused to be called the son of Pharaoh’s daughter, choosing rather to be mistreated with the people of God than to enjoy the fleeting pleasures of sin. He considered the reproach of Christ greater wealth than the treasures of Egypt, for he was looking to the reward. By faith he left Egypt, not being afraid of the anger of the king, for he endured as seeing him who is invisible. By faith he kept the Passover and sprinkled the blood, so that the Destroyer of the firstborn might not touch them.

By faith the people crossed the Red Sea as on dry land, but the Egyptians, when they attempted to do the same, were drowned. By faith the walls of Jericho fell down after they had been encircled for seven days. By faith Rahab the prostitute did not perish with those who were disobedient, because she had given a friendly welcome to the spies.

And what more shall I say? For time would fail me to tell of Gideon, Barak, Samson, Jephthah, of David and Samuel and the prophets— who through faith conquered kingdoms, enforced justice, obtained promises, stopped the mouths of lions, quenched the power of fire, escaped the edge of the sword, were made strong out of weakness, became mighty in war, put foreign armies to flight. Women received back their dead by resurrection. Some were tortured, refusing to accept release, so that they might rise again to a better life. Others suffered mocking and flogging, and even chains and imprisonment. They were stoned, they were sawn in two, they were killed with the sword. They went about in skins of sheep and goats, destitute, afflicted, mistreated— of whom the world was not worthy—wandering about in deserts and mountains, and in dens and caves of the earth.

And all these, though commended through their faith, did not receive what was promised, since God had provided something better for us, that apart from us they should not be made perfect.

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विश्वास का अर्थ है, जिसकी हम आशा करते हैं, उसके लिए निश्चित होना। और विश्वास का अर्थ है कि हम चाहे किसी वस्तु को देख नहीं रहे हो किन्तु उसके अस्तित्त्व के विषय में निश्चित होना कि वह है।इसी कारण प्राचीन काल के लोगों को परमेश्वर का आदर प्राप्त हुआ था।

विश्वास के आधार पर ही हम यह जानते हैं कि परमेश्वर के आदेश से ब्रह्माण्ड की रचना हुई थी। इसलिए जो दृश्य है, वह दृश्य से ही नहीं बना है। हाबिल ने विश्वास के कारण ही परमेश्वर को कैन से उत्तम बलि चढ़ाई थी। विश्वास के कारण ही उसे एक धर्मी पुरुष के रूप में तब सम्मान मिला था जब परमेश्वर ने उसकी भेंटों की प्रशंसा की थी। और विश्वास के कारण ही वह आज भी बोलता है यद्यपि वह मर चुका है।

विश्वास के कारण ही हनोक को इस जीवन से ऊपर उठा लिया गया ताकि उसे मृत्यु का अनुभव न हो। परमेश्वर ने क्योंकि उसे दूर हटा दिया था इसलिए वह पाया नहीं गया। क्योंकि उसे उठाए जाने से पहले परमेश्वर को प्रसन्न करने वाले के रूप में उसे सम्मान मिल चुका था।और विश्वास के बिना तो परमेश्वर को प्रसन्न करना असम्भव है। क्योंकि हर एक वह जो उसके पास आता है, उसके लिए यह आवश्यक है कि वह इस बात का विश्वास करे कि परमेश्वर का अस्तित्व है और वे जो उसे सच्चाई के साथ खोजते हैं, वह उन्हें उसका प्रतिफल देता है।

विश्वास के कारण ही नूह को जब उन बातों की चेतावनी दी गयी जो उसने देखी तक नहीं थी तो उसने पवित्र भयपूर्वक अपने परिवार को बचाने के लिए एक नाव का निर्माण किया था। अपने विश्वास से ही उसने इस संसार को दोषपूर्ण माना और उस धार्मिकता का उत्तराधिकारी बना जो विश्वास से आती है।

विश्वास के कारण ही, जब इब्राहीम को ऐसे स्थान पर जाने के लिए बुलाया गया था, जिसे बाद में उत्तराधिकार के रूप में उसे पाना था, यद्यपि वह यह जानता तक नहीं था कि वह कहाँ जा रहा है, फिर भी उसने आज्ञा मानी और वह चला गया। विश्वास के कारण ही जिस धरती को देने का उसे वचन दिया गया था, उस पर उसने एक अनजाने परदेसी के समान अपना घर बनाकर निवास किया। वह तम्बुओं में वैसे ही रहा जैसे इसहाक और याकूब रहे थे जो उसके साथ परमेश्वर की उसी प्रतिज्ञा के उत्तराधिकारी थे। वह सुदृढ़ आधार वाली उस नगरी की बाट जोह रहा था जिसका शिल्पी और निर्माणकर्ता परमेश्वर है।

विश्वास के कारण ही, इब्राहीम जो बूढ़ा हो चुका था और सारा जो स्वयं बाँझ थी, जिसने वचन दिया था, उसे विश्वसनीय समझकर गर्भवती हुई और इब्राहीम को पिता बना दिया। और इस प्रकार इस एक ही व्यक्ति से जो मरियल सा था, आकाश के तारों जितनी असंख्य और सागर-तट के रेत-कणों जितनी अनगिनत संतानें हुई।

विश्वास को अपने मन में लिए हुए ये लोग मर गए। जिन वस्तुओं की प्रतिज्ञा दी गयी थी, उन्होंने वे वस्तुएँ नहीं पायीं। उन्होंने बस उन्हें दूर से ही देखा और उनका स्वागत किया तथा उन्होंने यह मान लिया कि वे इस धरती पर परदेसी और अनजाने हैं। वे लोग जो ऐसी बातें कहते हैं, वे यह दिखाते हैं कि वे एक ऐसे देश की खोज में हैं जो उनका अपना है। यदि वे उस देश के विषय में सोचते जिसे वे छोड़ चुके हैं तो उनके फिर से लौटने का अवसर रहता किन्तु उन्हें तो स्वर्ग के एक श्रेष्ठ प्रदेश की उत्कट अभिलाषा है। इसलिए परमेश्वर को उनका परमेश्वर कहलाने में संकोच नहीं होता, क्योंकि उसने तो उनके लिए एक नगर तैयार कर रखा है।

विश्वास के कारण ही इब्राहीम ने, जब परमेश्वर उसकी परीक्षा ले रहा था, इसहाक की बलि चढ़ाई। वही जिसे प्रतिज्ञाएँ प्राप्त हुई थीं, अपने एक मात्र पुत्र की जब बलि देने वाला था तो यद्यपि परमेश्वर ने उससे कहा था, “इसहाक के द्वारा ही तेरा वंश बढ़ेगा।”किन्तु इब्राहीम ने सोचा कि परमेश्वर मरे हुए को भी जिला सकता है और यदि आलंकारिक भाषा में कहा जाए तो उसने इसहाक को मृत्यु से फिर वापस पा लिया।

विश्वास के कारण ही इसहाक ने याकूब और इसाऊ को उनके भविष्य के विषय में आशीर्वाद दिया। विश्वास के कारण ही याकूब ने, जब वह मर रहा था, यूसुफ़ के हर पुत्र को आशीर्वाद दिया और अपनी लाठी के ऊपरी सिरे पर झुक कर सहारा लेते हुए परमेश्वर की उपासना की।

विश्वास के कारण ही यूसुफ़ ने जब उसका अंत निकट था, इस्राएल निवासियों के मिस्र से निर्गमन के विषय में बताया तथा अपनी अस्थियों के बारे में आदेश दिए।

विश्वास के आधार पर ही, मूसा के माता-पिता ने, मूसा के जन्म के बाद उसे तीन महीने तक छुपाए रखा क्योंकि उन्होंने देख लिया था कि वह कोई सामान्य बालक नहीं था और वे राजा की आज्ञा से नहीं डरे।

विश्वास से ही, मूसा जब बड़ा हुआ तो उसने फिरौन की पुत्री का बेटा कहलाने से इन्कार कर दिया। उसने पाप के क्षणिक सुख भोगों की अपेक्षा परमेश्वर के संत जनों के साथ दुर्व्यवहार झेलना ही चुना। उसने मसीह के लिए अपमान झेलने को मिस्र के धन भंडारों की अपेक्षा अधिक मूल्यवान माना क्योंकि वह अपना प्रतिफल पाने की बाट जोह रहा था।

विश्वास के कारण ही, राजा के कोप से न डरते हुए उसने मिस्र का परित्याग कर दिया; वह डटा रहा, मानो उसे अदृश्य परमेश्वर दिख रहा हो। विश्वास से ही, उसने फसह पर्व और लहू छिड़कने का पालन किया, ताकि पहली संतानों का विनाश करने वाला, इस्राएल की पहली संतान को छू तक न पाए।

विश्वास के कारण ही, लोग लाल सागर से ऐसे पार हो गए जैसे वह कोई सूखी धरती हो। किन्तु जब मिस्र के लोगों ने ऐसा करना चाहा तो वे डूब गए।

विश्वास के कारण ही, यरिहो का नगर-परकोटा लोगों के सात दिन तक उसके चारों ओर परिक्रमा कर लेने के बाद ढह गया।

विश्वास के कारण ही, राहब नाम की वेश्या आज्ञा का उल्लंघन करने वालों के साथ नहीं मारी गयी थी क्योंकि उसने गुप्तचरों का स्वागत सत्कार किया था।

अब मैं और अधिक क्या कहूँ। गिदोन, बाराक, शिमशोन, यिफतह, दाऊद, शमुएल तथा उन नबियों की चर्चा करने का मेरे पास समय नहीं है जिन्होंने विश्वास से, राज्यों को जीत लिया, धार्मिकता के कार्य किए तथा परमेश्वर ने जो देने का वचन दिया था, उसे प्राप्त किया। जिन्होंने सिंहों के मुँह बंद कर दिए,लपलपाती लपटों के क्रोध को शांत किया तथा तलवार की धार से बच निकले; जिनकी दुर्बलता ही शक्ति में बदल गई; और युद्ध में जो शक्तिशाली बने तथा जिन्होंने विदेशी सेनाओं को छिन्न-भिन्न कर डाला।स्त्रियों ने अपने मरे हुओं को फिर से जीवित पाया। बहुतों को सताया गया, किन्तु उन्होंने छुटकारा पाने से मना कर दिया ताकि उन्हें एक और अच्छे जीवन में पुनरूत्थान मिल सके।कुछ को उपहासों और कोड़ों का सामना करना पड़ा जबकि कुछ को ज़ंजीरों से जकड़ कर बंदीगृह में डाल दिया गया।कुछ पर पथराव किया गया। उन्हें आरे से चीर कर दो फाँक कर दिया गया, उन्हें तलवार से मौत के घाट उतार दिया गया। वे ग़रीब थे, उन्हें यातनाएँ दी गई और उनके साथ बुरा व्यवहार किया गया। वे भेड़-बकरियों की खालें ओढ़े इधर-उधर भटकते रहे। यह संसार उनके योग्य नहीं था। वे बियाबानों, और पहाड़ों में घूमते रहे और गुफाओं और धरती में बने बिलों में, छिपते-छिपाते फिरे।

अपने विश्वास के कारण ही, इन सब को सराहा गया। फिर भी परमेश्वर को जिसका महान वचन उन्हें दिया था, उसे इनमें से कोई भी नहीं पा सका। परमेश्वर के पास अपनी योजना के अनुसार हमारे लिए कुछ और अधिक उत्तम था जिससे उन्हें भी बस हमारे साथ ही सम्पूर्ण सिद्ध किया जाए।

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信就是所望之事的實底,是未見之事的確據。古人在這信上得了美好的證據。我們因著信,就知道諸世界是藉神話造成的;這樣,所看見的並不是從顯然之物造出來的。亞伯因著信獻祭於神,比該隱所獻的更美,因此便得了稱義的見證,就是神指他禮物作的見證。他雖然死了,卻因這信仍舊說話。以諾因著信被接去,不至於見死,人也找不著他,因為神已經把他接去了;只是他被接去以先,已經得了神喜悅他的明證。人非有信就不能得神的喜悅,因為到神面前來的人必須信有神,且信他賞賜那尋求他的人。挪亞因著信,既蒙神指示他未見的事,動了敬畏的心,預備了一隻方舟,使他全家得救;因此就定了那世代的罪,自己也承受了那從信而來的義。

亞伯拉罕因著信,蒙召的時候就遵命出去,往將來要得為業的地方去;出去的時候,還不知往哪裡去。他因著信,就在所應許之地作客,好像在異地居住帳篷,與那同蒙一個應許的以撒、雅各一樣。因為他等候那座有根基的城,就是神所經營、所建造的。因著信,連撒拉自己,雖然過了生育的歲數,還能懷孕,因她以為那應許她的是可信的。所以從一個彷彿已死的人就生出子孫,如同天上的星那樣眾多,海邊的沙那樣無數。

這些人都是存著信心死的,並沒有得著所應許的,卻從遠處望見,且歡喜迎接,又承認自己在世上是客旅,是寄居的。說這樣話的人,是表明自己要找一個家鄉。他們若想念所離開的家鄉,還有可以回去的機會。他們卻羨慕一個更美的家鄉,就是在天上的。所以神被稱為他們的神,並不以為恥,因為他已經給他們預備了一座城。

亞伯拉罕因著信,被試驗的時候,就把以撒獻上;這便是那歡喜領受應許的,將自己的獨生的兒子獻上。論到這兒子,曾有話說:「從以撒生的才要稱為你的後裔。」他以為神還能叫人從死裡復活,他也彷彿從死中得回他的兒子來。

以撒因著信,就指著將來的事給雅各、以掃祝福。雅各因著信,臨死的時候給約瑟的兩個兒子各自祝福,扶著杖頭敬拜神。約瑟因著信,臨終的時候提到以色列族將來要出埃及,並為自己的骸骨留下遺命。 摩西生下來,他的父母見他是個俊美的孩子,就因著信,把他藏了三個月,並不怕王命。

摩西因著信,長大了就不肯稱為法老女兒之子。他寧可和神的百姓同受苦害,也不願暫時享受罪中之樂。他看為基督受的凌辱比埃及的財物更寶貴,因他想望所要得的賞賜。他因著信,就離開埃及,不怕王怒;因為他恆心忍耐,如同看見那不能看見的主。他因著信,就守逾越節,行灑血的禮,免得那滅長子的臨近以色列人。

他們因著信,過紅海如行乾地;埃及人試著要過去,就被吞滅了。以色列人因著信,圍繞耶利哥城七日,城牆就倒塌了。妓女喇合因著信,曾和和平平地接待探子,就不與那些不順從的人一同滅亡。

我又何必再說呢?若要一一細說基甸、巴拉、參孫、耶弗他、大衛、撒母耳和眾先知的事,時候就不夠了。他們因著信,制伏了敵國,行了公義,得了應許,堵了獅子的口,滅了烈火的猛勢,脫了刀劍的鋒刃,軟弱變為剛強,爭戰顯出勇敢,打退外邦的全軍。

有婦人得自己的死人復活。又有人忍受嚴刑,不肯苟且得釋放,為要得著更美的復活。又有人忍受戲弄、鞭打、捆鎖、監禁、各等的磨煉,被石頭打死,被鋸鋸死,受試探,被刀殺,披著綿羊、山羊的皮各處奔跑,受窮乏、患難、苦害,在曠野、山嶺、山洞、地穴漂流無定,本是世界不配有的人。這些人都是因信得了美好的證據,卻仍未得著所應許的。 因為神給我們預備了更美的事,叫他們若不與我們同得,就不能完全。

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